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इंसान होना: धर्म से परे एक यात्रा

लेखिका: पुष्पांजलि | ब्लॉग: मन का फितूर

कुछ रचनाएँ नहीं लिखी जातीं—वे अनुभव से बहकर आती हैं। जैसे किसी शांत नदी का जल, जो अपने प्रवाह में समय को समेटे चलता है। ऊपर दिए गए शब्द मेरी आत्मा की सतह से उपजे हैं। यह सिर्फ कविता नहीं, मेरे भीतर पलती एक यात्रा है—विचारों से शुरू होकर इंसानियत की ठांव तक पहुँचने वाली।

जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो वह न धर्म जानता है, न जाति, न भाषा। वह बस एक सांस लेता है—शुद्ध, निष्कलुष। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज धीरे-धीरे उसके हाथ में अपनी परंपराएँ थमा देता है। उसे सिखाया जाता है कि किस ईश्वर को पूजना है, किस विधि से पूजा करनी है, और क्या सही है, क्या गलत।

पर क्या हमने कभी रुककर उस मासूम मन से पूछा है कि वह क्या चाहता है?

इस कविता में वह बच्चा, जो आगे चलकर बड़ा होता है, अपने विचारों की आंखों से दुनिया को देखना चाहता है। उसे विरासत में धर्म नहीं चाहिए, उसे खुद की समझ चाहिए। वह केवल एक परंपरा का अंधानुकरण नहीं करना चाहता, बल्कि सत्य की तलाश में तर्क और भावना दोनों की नाव पर सवार होना चाहता है।

जब उसने कहा—"थोड़ा वक्त चाहिए मुझे", तो उसमें एक अद्भुत गहराई थी। यह कोई विद्रोह नहीं था, यह एक आत्म-अन्वेषण की शुरुआत थी। एक ऐसा साहसी कदम जहाँ बच्चा अपनी चेतना के स्तर पर खुद तय करता है कि उसका धर्म क्या है।

समय उसकी पाठशाला बनता है। इतिहास उसके शिक्षक। वह पुरानी किताबों से, कहानियों से, झूठ और सच के बीच की लकीरों से गुजरता है। धर्मों की दीवारें उसके आगे आती हैं, लेकिन वह दीवारों को नहीं, दरवाज़ों को खोजता है। वह किसी एक ईश्वर को नहीं, पूरी सृष्टि को महसूसना चाहता है।

और अंततः, जब वह अपने माता-पिता का हाथ थामकर कहता है—"शुक्रिया, मैंने चुना है इंसान बनना", तो यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। यह उस स्वतंत्र सोच की जीत है जो आज के समय में सबसे दुर्लभ होती जा रही है।

ध्यान से देखिए तो यह पंक्तियाँ केवल किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं हैं। यह हम सभी की संभावित कहानी है—अगर हम चाहें तो।

जब वह बड़ा हुआ इंसान पेड़ों से बात करने लगा, नदी के किनारे बैठकर खुद को टटोलने लगा, हवा में अपने प्रतिबिंब को देखने लगा—तो वह दरअसल आत्मा की भाषा बोलने लगा। वह अब किसी मंदिर-मस्जिद में बंद नहीं था। वह खुले आकाश, बहती नदी और शांत पेड़ों में अपने ईश्वर को देखने लगा।

"मैं हिस्सा हूं प्रकृति का, और यही मेरा धर्म है"—यह पंक्ति इस समूचे भाव का सार है।

यह कविता एक निवेदन है—धर्म को प्रश्नों से देखने का। यह एक आमंत्रण है कि हम अपने बच्चों को सोचने की स्वतंत्रता दें, चुनने का साहस दें, और सबसे ज़रूरी—इंसान बनने की छूट दें।

आज जब धर्म के नाम पर समाज खाँचों में बंटा हुआ है, यह रचना एक दर्पण है, जो हमें दिखाती है कि धर्म यदि इंसानियत से ऊपर है, तो वह अधूरा है। और अगर कोई धर्म हमें प्रकृति से जोड़ने की बजाय तोड़ता है, तो वह हमें अधम बनाता है।

मैंने जब ये शब्द लिखे, तो भीतर बहुत कुछ उमड़ रहा था। शायद इसलिए भी कि आज हम सबसे ज़्यादा जिस चीज़ से दूर हो गए हैं—वह है प्रकृति और मानवता

इसलिए ‘मन का फितूर’ पर यह लेख उन सभी के लिए है, जो धर्म से परे जाकर धर्मात्मा बनना चाहते हैं। जो परंपराओं को समझने से पहले महसूस करना चाहते हैं। जो ये मानते हैं कि ईश्वर कोई मूर्ति नहीं, एक अनुभव है। और सबसे बड़ा अनुभव है—इंसान होकर जीना।


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