कुछ रचनाएँ लिखी नहीं जातीं, वे भीतर की पीड़ा से रिसती हैं। “गेहूँ की बालियाँ” ऐसी ही एक कविता है—एक साक्षात्कार है गाँव की उस सच्चाई से, जिसे अक्सर शहर की खिड़कियों पर टपकती बारिश की बूंदें छुपा लेती हैं। यह कविता हमारे समय की एक कड़वी, लेकिन ज़रूरी सच्चाई को शब्द देती है। यह कविता नहीं, एक दर्पण है—जिसमें हम सबको कभी न कभी झांकना चाहिए।
जब खेत रोते हैं, कविता चुप नहीं रह सकती।
हमारे देश में खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, एक जीवनशैली है—एक संस्कृति है। पर आज उसी संस्कृति की रीढ़ झुकती जा रही है, और हम, एक पूरे समाज के रूप में, इसे बस मौन होकर देख रहे हैं। कविता की पंक्तियों में 'नमी' जीवन की नहीं, नाश की सूचक बन चुकी है—और यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है।
हमने जब भी बारिश को देखा, वो या तो रोमांटिक लगी या सुकूनदायक। शहर की छतों पर खड़े होकर उसे जीने का मौका मिला, लेकिन खेत की कच्ची ज़मीन पर जब वो समय से पहले गिरती है, तो हर बूँद एक किसान की नींद छीन लेती है। ‘गेहूँ की बालियाँ’ शहर और गाँव की संवेदनाओं के बीच की खाई को इस तरह उजागर करती है कि पाठक अपने ही भावों पर सवाल उठाने लगे—क्या मेरा सौंदर्यबोध किसी और की त्रासदी से उपजा है?
कविता का स्वर न आक्रोश से भरा है, न करुणा से लथपथ। यह एक धीमा, गहरा और सधा हुआ शोकगीत है। इसमें कोई नारे नहीं, कोई आरोप नहीं। केवल एक निरीह दृष्टि है, जो देखती है और लिखती है। यह वही दृष्टि है जो “झुकी हुई बालियों” को देखकर सिर्फ मौसम की मार नहीं पढ़ती, बल्कि उसमें किसान की झुकी हुई पीठ, उसकी टूटी हुई उम्मीदें और उसकी मौन स्वीकारोक्ति को देखती है।
"वे झुक गई हैं जैसे किसान की रीढ़..." — इस एक बिम्ब में न केवल शारीरिक थकावट, बल्कि वर्षों से जमा होता मानसिक बोझ, सामाजिक उपेक्षा और नीति-निर्माण की विफलता भी समाहित है। यह कविता हमें चेताती है कि जब तक हम गाँवों की आवाज़ को सिर्फ आंकड़ों में बाँधकर देखेंगे, तब तक हम असल भारत को नहीं समझ पाएंगे।
शहरों में बारिश कविता बन जाती है—क्योंकि वहाँ पेट भरे होते हैं। वहाँ बारिश की आवाज़ संगीत बन जाती है, खिड़कियों से टपकती बूंदें प्रेम की पंक्तियों में ढल जाती हैं। लेकिन गाँव में वही बारिश एक मौन बनकर गिरती है, ऐसा मौन जो भूख से भी भारी होता है। यह कविता उसी मौन को आवाज़ देती है।
मैंने ‘अभिशप्तता’ शब्द का प्रयोग कर अंत में जो भाव दिया है, वह केवल एक पीड़ा नहीं, बल्कि एक इतिहास है। हर मौसम में दोहराई जाने वाली वही त्रासदी, वही असहायता—एक ऐसा दुष्चक्र जिससे निकलने की कोई राह नज़र नहीं आती।
“गेहूँ की बालियाँ” उन रचनाओं में से है जो हमें हमारे विशेषाधिकार का एहसास कराती है। यह कविता अपने पाठकों से सिर्फ सराहना नहीं, उत्तरदायित्व भी माँगती है। यह उन प्रश्नों को उठाती है जिनसे हम अक्सर मुँह मोड़ते हैं—क्योंकि जवाब देने के लिए हमें अपने भीतर झाँकना होगा, और वहाँ अक्सर हमें हमारी असंवेदनशीलता ही दिखाई देती है।
“Mann ka Fitoor” में मैंने इसलिए लिखना शुरू किया है क्योंकि कुछ भाव ऐसे होते हैं जो मन में बसकर रह जाते हैं—वे चुप रहते हैं, पर शोर मचाते हैं। वे केवल सुने जाने की नहीं, महसूस किए जाने की प्रतीक्षा करते हैं। मेरे लिए यह ब्लॉग उन्हीं भावों की आवाज़ है—एक ऐसा मंच जहाँ मन के भीतर का फितूर शब्दों में ढलकर सामने आता है।
हम सबके भीतर कहीं न कहीं वो बालियाँ हैं—जो उम्मीद से लदी हैं, लेकिन समय से पहले भीगने का डर लिए जी रही हैं। यह कविता हमें सिर्फ खेतों की नहीं, हमारे अंतर्मन की बात भी बताती है।
यदि इस कविता ने आपको कुछ पल के लिए भी रुककर सोचने पर मजबूर किया हो—तो मानिएगा, यह सिर्फ कविता नहीं, एक ज़रूरी दस्तावेज़ है।

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