लेखिका: पुष्पांजलि | ब्लॉग: मन का फितूर कुछ रचनाएँ नहीं लिखी जातीं—वे अनुभव से बहकर आती हैं। जैसे किसी शांत नदी का जल, जो अपने प्रवाह में समय को समेटे चलता है। ऊपर दिए गए शब्द मेरी आत्मा की सतह से उपजे हैं। यह सिर्फ कविता नहीं, मेरे भीतर पलती एक यात्रा है—विचारों से शुरू होकर इंसानियत की ठांव तक पहुँचने वाली। जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो वह न धर्म जानता है, न जाति, न भाषा। वह बस एक सांस लेता है—शुद्ध, निष्कलुष। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज धीरे-धीरे उसके हाथ में अपनी परंपराएँ थमा देता है। उसे सिखाया जाता है कि किस ईश्वर को पूजना है, किस विधि से पूजा करनी है, और क्या सही है, क्या गलत। पर क्या हमने कभी रुककर उस मासूम मन से पूछा है कि वह क्या चाहता है? इस कविता में वह बच्चा, जो आगे चलकर बड़ा होता है, अपने विचारों की आंखों से दुनिया को देखना चाहता है। उसे विरासत में धर्म नहीं चाहिए, उसे खुद की समझ चाहिए। वह केवल एक परंपरा का अंधानुकरण नहीं करना चाहता, बल्कि सत्य की तलाश में तर्क और भावना दोनों की नाव पर सवार होना चाहता है। जब उसने कहा— "थोड़ा वक्त चाहिए मुझे" , तो उ...
"Mann ka Fitoor" is not just a blog—it’s a voice, a vision, and a space where thoughts breathe freely. I write poetry that reflects love, irony, society, and self. By profession, I belong to the education field, but my heart beats in verses and metaphors.