लेखिका: पुष्पांजलि | ब्लॉग: मन का फितूर कुछ रचनाएँ नहीं लिखी जातीं—वे अनुभव से बहकर आती हैं। जैसे किसी शांत नदी का जल, जो अपने प्रवाह में समय को समेटे चलता है। ऊपर दिए गए शब्द मेरी आत्मा की सतह से उपजे हैं। यह सिर्फ कविता नहीं, मेरे भीतर पलती एक यात्रा है—विचारों से शुरू होकर इंसानियत की ठांव तक पहुँचने वाली। जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो वह न धर्म जानता है, न जाति, न भाषा। वह बस एक सांस लेता है—शुद्ध, निष्कलुष। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता है, समाज धीरे-धीरे उसके हाथ में अपनी परंपराएँ थमा देता है। उसे सिखाया जाता है कि किस ईश्वर को पूजना है, किस विधि से पूजा करनी है, और क्या सही है, क्या गलत। पर क्या हमने कभी रुककर उस मासूम मन से पूछा है कि वह क्या चाहता है? इस कविता में वह बच्चा, जो आगे चलकर बड़ा होता है, अपने विचारों की आंखों से दुनिया को देखना चाहता है। उसे विरासत में धर्म नहीं चाहिए, उसे खुद की समझ चाहिए। वह केवल एक परंपरा का अंधानुकरण नहीं करना चाहता, बल्कि सत्य की तलाश में तर्क और भावना दोनों की नाव पर सवार होना चाहता है। जब उसने कहा— "थोड़ा वक्त चाहिए मुझे" , तो उ...
लेखिका: पुष्पांजलि | ब्लॉग: Mann ka Fitoor कुछ रचनाएँ लिखी नहीं जातीं, वे भीतर की पीड़ा से रिसती हैं। “गेहूँ की बालियाँ” ऐसी ही एक कविता है—एक साक्षात्कार है गाँव की उस सच्चाई से, जिसे अक्सर शहर की खिड़कियों पर टपकती बारिश की बूंदें छुपा लेती हैं। यह कविता हमारे समय की एक कड़वी, लेकिन ज़रूरी सच्चाई को शब्द देती है। यह कविता नहीं, एक दर्पण है—जिसमें हम सबको कभी न कभी झांकना चाहिए। जब खेत रोते हैं, कविता चुप नहीं रह सकती। हमारे देश में खेती सिर्फ एक पेशा नहीं, एक जीवनशैली है—एक संस्कृति है। पर आज उसी संस्कृति की रीढ़ झुकती जा रही है, और हम, एक पूरे समाज के रूप में, इसे बस मौन होकर देख रहे हैं। कविता की पंक्तियों में 'नमी' जीवन की नहीं, नाश की सूचक बन चुकी है—और यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है। हमने जब भी बारिश को देखा, वो या तो रोमांटिक लगी या सुकूनदायक। शहर की छतों पर खड़े होकर उसे जीने का मौका मिला, लेकिन खेत की कच्ची ज़मीन पर जब वो समय से पहले गिरती है, तो हर बूँद एक किसान की नींद छीन लेती है। ‘गेहूँ की बालियाँ’ शहर और गाँव की संवेदनाओं के बीच की खाई को इस तरह उजागर करती है...